एक गुल्लक खूबसूरत यादों की...

वो भी क्या दिन थे...बचपन के...हम सब अपने बचपन से लेकर बड़े होने के किस्सों को कुछ ऐसे ही संजोये रखते हैं। अपना बचपन साथ लेकर घूमते हैं चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों ना रहें। यादों की एक गुल्लक सी हमेशा साथ रहती है। जेब खर्च के लिए मिले पैसे तो कब के खत्म हो चुके होते हैं। लेकिन यादों की वो पूंजी इस गुल्लक में हमेशा बनी रहती है। मलेशिया में रह रहीं लेखिका मनीषा श्री की किताब जिंदगी की गुल्लक भी यादों का एक ऐसा ही कोलाज है। जिंदगी की कतरनें हैं.... रंग बिरंगी तो कभी सोचने के लिए मजबूर करने वाली। लिखने वाले का मकसद क्या होता है। वो लिखने के बहाने खुद को जीता है और अगर पढ़ने वाला इन यादों में अपना अक्स तलाशने लगे तो यकीनन लेखक की कामयाबी है। इस लिहाज से मनीषा श्री की जिंदगी की गुल्लक निश्चित तौर पर अपनी बात बिना शोर शराबे के चुपके से कानों में कह जाती है। यादों के इस गुलदस्ते में मनीषा ने प्रयोग करने का जोखिम लिया है। कभी कविता तो कभी कहानी तो कभी डायरी के पन्ने के तौर पर अपनी बात कहने की कोशिश की है। इस लिहाज से उनकी किताब एक सराहनीय कोशिश है। सरल लिखना दुनिया का सबसे जटिल काम है। लेकिन किताब पढ़ने से ये अहसास होता है कि मनीषा ने वाकई इस जटिलता का निर्वाह बड़ी सरलता से किया है।
किताबों में से कुछ अंश
पहला अध्याय
इसी क्रम में किताब के कुछ प्रमुख अध्यायों पर एक संक्षिप्त नजर डालें, तो इसका पहला अध्याय ‘शब्द’ किताब की वास्तविक भूमिका है। इसमें जीवन की आपा-धापी से कुछ समय मिलने पर लेखिका में लेखन की अन्त:प्रेरणा उत्पन्न होती है, और वो अपनी सबसे प्यारी सहेली यानी अपनी डायरी की तरफ मुड़ती है।
दूसरा अध्याय
दूसरे अध्याय में चीजें फ्लैशबैक में चली जाती हैं और एक बच्चे को जन्म देने जा रही लेखिका काफी पीछे शादी से पहले की आईआईटी में आॅल इंडिया 20 रैंक लाने वाली एक छात्रा हो जाती है, जिसे तब उसके नाना समझाते हैं कि कामयाबियां कितनी भी बड़ी हों, कदम हमेशा जमीन पर ही रहने चाहिए और नाना की यही सीख लेखिका के इस अध्याय की कविता है... कदम जमीन पर रहें।
तीसरा अध्याय
तीसरे अध्याय ‘जिंदगी’ में लेखिका आईआईटी मे अंतिम वर्ष में है, लेकिन आर्थिक मंदी के कारण प्लेसमेंट करने कोई कंपनी नहीं आ रही, जिस कारण बेहद हताश और परेशान है। वो काबिल है, लेकिन किस्मत के कारण उसे नौकरी नहीं मिल पा रही। तिस पर घर वालों की उम्मीदों का दबाव अलग है। इन तनावों में उलझा उसका दिमाग एक बारगी आत्महत्या जैसी चीज तक सोच लेता है। हताशा की इस हालत में जब फोन पर उसके पापा यह कहते हैं कि ‘पापा इज आॅलवेज विथ यू’ तो जैसे उसे ‘लाइफ टॉनिक’ मिल जाती है और जिंदगी फिर खूबसूरत लगने लगती है।

      सारी किताबें यहीं पर पढ़ लेंगे क्या? आॅनलाइन बुक्स (online bookstore) स्टोर पर जाइए, किताब खरीदें (buy books online) और बाकी बेहद खूबसूरत किताब का आनंद उठाएं। यह किताब जल्द ही  www.yourbookstall.com पर बडे डिस्काउंट के साथ उपलब्ध होगी। 

No comments:

Theme images by sndr. Powered by Blogger.