इतवार छोटा पड़ गया - इस सादगी में इक बात है...


यह अब रूढ़ि हो गई है कि जब भी हिन्दी ग़ज़लों की बात हो, दुष्यंत कुमार के ज़िक्र से शुरू हो. दूसरी रूढ़ि यह भी है कि जब भी हिन्दी ग़ज़लों का ज़िक्र किया जाए, इस बात का भी उल्लेख किया जाए कि हिन्दी की शास्त्रीय आलोचना ने कैसे हिन्दी ग़ज़लों की अवहेलना की है. दुर्भाग्य से इस टिप्पणी में भी इन रूढ़ियों से मुक्ति संभव नहीं है. हिन्दी ग़ज़लों पर दुष्यंत की छाया इतनी बड़ी है कि हर किसी पर उसका कुछ असर खोजा जा सकता है. इसी तरह यह शिकायत भी वैध है कि आधुनिक हिन्दी कविता की जो मुख्यधारा रही है, वह गीतों-नवगीतों या ग़ज़लों को कुछ संदेह से देखती रही है.
    'इतवार छोटा पड़ गया' की ग़ज़लों से गुजरते हुए जो सबसे पहली बात ध्यान खींचती है, वह है प्रताप सोमवंशी के बयान की सादगी. कई बार लगता है कि प्रताप कुछ लिख नहीं, बस, कह रहे हैं और इसमें कुछ ख़ास बात नहीं है. मगर यह धोखादेह सादगी है - क्योंकि उनके यहां बिल्कुल आमफ़हम लगने वाले शेरों के बीच अचानक मर्म को छू लेने वाली चीज़ें चली आती हैं. जब वह कहते हैं, 'राम तुम्हारे युग का रावण अच्छा था, दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था' तो लगता है कि वह हमारे समय की एक विडम्बना को मंचीय और तालीपिटाऊ आकर्षक भाषा में रखने की तरकीब जानते हैं, लेकिन इसी ग़ज़ल में अचानक कई शेर जैसे क़दम रोक लेते हैं - अपने-आप को देखती, अपना सच और साहस संजोती पंक्तियां सामने आ खड़ी होती हैं - 'शाम ढले ये टीस तो भीतर उठती है, मेरा ख़ुद से हर इक वादा झूठा था, ये भी था कि दिल को कितना समझा लो, बात गलत होती थी तो वो लड़ता था, भूल भटक कर सबको ही याद आता है, पुरखों का सच हर पीढ़ी में बोला था...'

ये जादुई ग़ज़लें नहीं हैं, ये अनायास आपको आकर्षित नहीं करतीं, लेकिन इनका मोल दूसरा है. ये हमारे समय की कशमकश को, अपने इंसान को बचाए रखने की दुविधा को, अपने ईमान को दांव पर न लगाने के धीरज को बहुत ईमानदारी से पकड़ती हैं - इनको पढ़ते हुए समझ में आता है कि इनका जादू देर से खुलता है और फिर देर तक टिकता है.

वह पूरे ज़माने की बात करते हैं - कहीं-कहीं नारे की तरह, मगर ज़्यादातर इतने सहज भाव में कि उन्हें जज़्ब करने में कुछ वक़्त लगता है. कई बार ये अशआर अपने वक़्त पर एक मुकम्मल बयान की तरह आते हैं, तो कई बार आने वाले वक़्तों का आईना हो जाते हैं. किसी बड़ी रचना की ख़ासियत यही होती है कि वह अपने समय में धंसी रहकर भी उससे अलग हो जाती है, उसके तमाम मानी निकाले जा सकते हैं. अरसा पहले उन्होंने एक खिलंदड़ा शेर लिखा था - सरासर झूठ बोले जा रहा है, हुंकारा अलग भरवा रहा है...' संभव है, बहुत सारे लोगों को यह शेर आज के हालात और हुक्मरान पर लगे.

दरअसल, उर्दू ग़ज़ल में सादगी की एक बहुत पुरानी परंपरा है. मीर तकी मीर उसके सबसे पुराने पुरखों में हैं. इस परंपरा को समकालीन समय में बिल्कुल आमफहम मुहावरे मिले हैं. नासिर काज़मी और निदा फ़ाज़ली से लेकर मुनव्वर राना तक यह सादगी तरह-तरह के पैरहन में दिखाई पड़ती है. दुष्यंत के बाद इस दौर तक आते-आते हिन्दी ग़ज़लों ने भी अपना चोला पूरी तरह बदला है. प्रताप सोमवंशी इसी साझा परंपरा की पैदाइश हैं, जिसमें वह अपना एक अलग रंग भी मिलाते हैं. 'इतवार छोटा पड़ गया' की ग़ज़लें इसका बहुत जीवंत सबूत हैं. वाणी प्रकाशन  द्वारा प्रकाशित यह किताब अब सभी  ऑनलाइन बुक्स स्टोर (Online bookstore) पर उपलब्ध है जहा से आप इसे खरीद (Buy books online) सकते है.


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