वाणी प्रकाशन से‘अभिनव सिनेमा’ का संशोधित और परिमार्जित संस्करण प्रकाशित

प्रचण्ड प्रवीर बिहार के मुंगेर ज़िले में जन्मे और पले-बढ़े हैं। इन्होंने सन् 2005 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से रासायनिक अभियान्त्रिकी में प्रौद्योगिकी स्नातक की उपाधि ग्रहण की। सन् 2010 में प्रकाशित इनके पहले उपन्यास अल्पाहारी गृहत्यागी : आई. आई. टी. से पहले’  ने कई युवा हिन्दी लेखकों को प्रेरित किया। नयी अध्ययन-दिशा देने के लिए सिनेमा अध्ययन और हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों ने सन्  2016 में प्रकाशित इनकी कथेतर पुस्तक  अभिनव सिनेमा :रस सिद्धान्त के आलोक में विश्व-सिनेमा का परिचय’ की प्रशंसा की। सन् 2016 में ही इनका पहला कथा संग्रह जाना नहीं दिल से दूर’ प्रकाशित हुआजिसे   हिन्दी कहानी-कला में एक नये चरण को प्रारम्भ करने का श्रेय दिया जाता है। इनका पहला अंग्रेज़ी कहानी संग्रह ‘Bhootnath Meets Bhairavi’ (भूतनाथ मीट्स भैरवी) सन्  2017 में प्रकाशित हुआ।

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित यह अभिनव सिनेमा’ का संशोधित और परिमार्जित संस्करण है।
पुस्तक के बारे मे:

सिनेमा पर भारतीय शास्त्रीय आलोचना परम्परा को आयद करने की कोशिश की शुरुआत करने वाली ऐसी पुस्तक विश्व-सिने-समीक्षा इतिहास में पहली है। इसमें बहुत जोख़िम उठाया गया है।
मतभेदों के बावजूद यह पुस्तक सही अर्थों में अपने क्षेत्र में एकदम नयी दृष्टि रखती और देती है, नूतन मार्ग बनाती है और अग्रगामी है। यह ऐसी अद्वितीय पुस्तक है कि मैं सख़्त सिफ़ारिश करता हूँ कि इसे व्यक्तिगत और सार्वजनिक रूप से ख़रीदा जाये और सिनेमा तथा हिन्दी के पाठ्यक्रम में अनिवार्यतः सम्मानजनक जगह दी जाये।-
विष्णु खरे

मैं रस-सिद्धान्त का जानकार नहीं हूँ, पर सिनेमा विधा के जादू ने मुझे बचपन से ही बुरी तरह से बाँध रखा है। मैंने इस विधा पर लिखा भी है, ख़ूब लिखा है और आज भी किताब पढ़ने से अधिक सिनेमा को वक़्त देता हूँ। सबटाइटल वाली फ़िल्मों को देखने की आदत है इसलिए सिनेमा देखना एक तरह से पढ़ना भी है। प्रचण्ड प्रवीर की इस किताब में रस-सिद्धान्त को विश्व-सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में बहुत शोध और मेहनत से देखा गया है। फ़िल्म को कई तरह से देखा और समझा जा सकता है इसलिए प्रवीर की इस पहल का स्वागत है। हिन्दी में विश्व-सिनेमा के सन्दर्भों की उच्चारण सम्बन्धी समस्या कम विकट नहीं है। प्रवीर को भी उससे जूझना पड़ा है। पर उन्होंने अंग्रेज़ी के रूप भी जगह-जगह दे दिये हैं। मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक फ़िल्म विधा को नये ढंग से देखने, जाँचने और समझने का मौक़ा देगी। मेरे प्रिय फ़िल्मकार गोदार की बात याद कर लूँ, फ़िल्म का प्रारम्भ, मध्य और अन्त होता है पर ज़रूरी नहीं है वह इसी क्रम में हो। इस पुस्तक को भी कुछ इसी तरह से पढ़ने की सुविधा है। उसी में उसका रस भी है।- विनोद भारद्वाज


Buy Books Online at huge discounts from Yourbookstall.com: The largest online bookstore of India.




No comments:

Theme images by sndr. Powered by Blogger.